दीक्षाभूमि को नमन करना मेंरा सौभाग्य - राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद


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नागपुर : कामठी स्थित ड्रैगन पैलेस विपश्यना सेंटर का उद्घाटन आज भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के हाथों संपन्न हुवा I उद्घाटन अवसर पर उन्होंने कहा की आध्यात्म की पावन धरती महाराष्ट्र में आने का अवसर मिलना अपने आप में बड़े सौभाग्य की बात है। महाराष्ट्र से जुड़ी अनेकों विशेषताएं और उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं; लेकिन यह राज्य आस्था और ध्यान के लिए सबसे अधिक जाना जाता है।

आज नागपुर में मुझे बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर द्वारा पवित्र की गई दीक्षाभूमि की पुण्य स्थली को नमन करने का सौभाग्य मिला। और यहां मैं विपस्सना ध्यान केंद्र का उद्घाटन कर रहा हूं। मेरी इस यात्रा के पीछे भगवान बुद्ध का आशीर्वाद है जिनकी शिक्षा 2,500 सालों से हमारे देश को प्रेरणा देती रही है। सम्राट अशोक से लेकर महाराष्ट्र के बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर तक भगवान बुद्ध से ही प्रेरित हुए थे। हमारा भारतीय संविधान भी मूलतः बौद्ध दर्शन के आदर्शो पर आधारित है जिसमें मानव-मानव के बीच समानता, भ्रातृत्व, और सामाजिक न्याय का सामंजस्य दिखता है। साथ ही, हमारे संविधान के निर्माता बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने संविधान-सभा में अपने अंतिम भाषण में बताया था कि हमारे लोकतन्त्र की जड़ें कितनी गहरी और पुरानी हैं। इस संदर्भ में उन्होने भगवान बुद्ध की परंपरा का उदाहरण दिया था। उन्होने कहा था कि भारत में संसदीय प्रणाली की जानकारी मौजूद थी। यह प्रणाली बौद्ध भिक्षु संघों द्वारा व्यवहार में लायी जाती थी। भिक्षु संघों ने इनका प्रयोग उस समय की राजनीतिक सभाओं से सीखा था। बौद्ध संघों में प्रस्ताव, संकल्प, कोरम, सचेतक, मत-गणना, निंदा-प्रस्ताव आदि के नियम थे। हमारे आधुनिक संविधान की रचना करके बाबासाहब ने इसी प्राचीन लोकतान्त्रिक परंपरा की फिर से प्रतिष्ठा की। बौद्ध दर्शन के मूल में एक क्रांतिकारी चेतना है जिसने पूरी मानवता को अभिभूत कर दिया है। यह भारत से निकलकर श्रीलंका, चीन, जापान, और इस तरह एशिया से होते हुए पूरी दुनिया में अपनी जड़ें जमा चुका है।

बौद्ध दर्शन में समाज को सुधारने का जो आदर्श है वह बाद की सदियों में अनेक समाज सुधार आंदोलनों को दिशा दिखाता रहा है। ऐसे कई आंदोलन महाराष्ट्र में ही हुए हैं। महाराष्ट्र में हुए समाज सुधार के आंदोलनों ने 19वीं और 20वीं सदी के दौरान भारत के अन्य क्षेत्रों के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया। भारत में प्राचीन काल से ही अपनाई गई विपश्यना जैसी ध्यान की पद्धतियां केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में काफी लोकप्रिय होती जा रही हैं। भगवान बुद्ध द्वारा प्रदिपादित ध्यान पद्धति ही विपश्यना है। विपश्यना का सीधा सा अर्थ है ठीक से देखना। अपनी साँस पर, अपने विचारों पर, अपने शरीर के हर हिस्से पर और अपनी भीतरी प्रवृत्तियों पर इतनी सजग निगाह रखना कि कुछ भी अनदेखा न रहे। ऐसा करने से हम अपने असली स्वरुप से जुड़ते हैं।

विपश्यना हमारे मन और शरीर को शुद्ध करने तथा आधुनिक जीवन के तनावों का सामना करने का प्रभावी तरीका है। यदि ठीक से अभ्यास किया जाए तो विपस्सना से वही लाभ मिल सकता है जो रोग निरोधी दवाओं से मिलता है। इस तरह, यह ध्यान की पद्धति होने के साथ साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। मुझे भी छब्बीस वर्ष पहले एक निर्धारित कोर्स के माध्यम से इस पद्धति से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। इसलिए इस भवन का उद्घाटन करते हुए मुझे अपार प्रसन्नता हो रही है।



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